1.
AUD-20180731-WA0009_ Shloka 116-120_रासलीला का श्रवण-कीर्तन करने की विधि
2.
AUD-20180730-WA0019_Shloka 115-116_रासलीला द्वारा जगत का अमंगल कैसे दूर होत
3.
AUD-20180729-WA0024_ Shloka 106-115_व्रज में कृष्ण की तीन वयस अवस्थाएं- कौम
4.
AUD-20180728-WA0013_Shloka 105-106_ वास्तविक अंतरंग शिष्य के लक्षण
5.
AUD-20180726-WA0007_Shloka 105 अमृतानुकणिका_अंतरंग भक्तों के लक्षण
6.
AUD-20180725-WA0014_Shloka 105 अमृतानुकणिका_अंतरंग शब्द की व्याख्या
7.
AUD-20180724-WA0010_Shloka 98-105_श्रीस्वरूप दामोदरजी के जीवन का संक्षिप्त
8.
AUD-20180723-WA0010_Shloka 90-98_सर्वकांति,सम्मोहिनी राधाजी
9.
AUD-20180722-WA0015_Shloka 89-91_सर्वपालिका,सर्वजगत माता,सर्वलक्ष्मीमयी, सर
10.
AUD-20180721-WA0026_Shloka 86-89_श्रीमती राधिका सर्वपूज्या, परम देवता
11.
AUD-20180720-WA0024_Shloka 86-87_राधाजी के नामों का वर्णन
12.
AUD-20180719-WA0019_Shloka 76-87_श्रीमती राधिकाजी का विस्तार
13.
AUD-20180718-WA0026_Shloka 74-75_श्रीकृष्ण की तीन प्रकार की प्रयासियाँ
14.
AUD-20180717-WA0024_Shloka 68-71_श्रीमती राधिकाजी के स्वरूप का वर्णन
15.
AUD-20180716-WA0031_Shloka 67_दो प्रकार के दृष्टा- कृष्ण और जीव
16.
AUD-20180715-WA0016_Shloka 66_वसुदेव का अर्थ
17.
AUD-20180712-WA0014_Shloka 64-66_तीन शक्तियों पर सन्धिनी वृत्ति की क्रिया
18.
AUD-20180711-WA0014_Shloka 64-65_दो प्रकार के सत्त्व-मिश्र सत्व, शुद्ध सत्त
19.
AUD-20180710-WA0015_Shloka 63_तीन गुणों का माया बद्ध जीव पर प्रभाव
20.
AUD-20180709-WA0015_Shloka 62_परतत्व भगवान चार रूपों में जगत में प्रकाशित
21.
AUD-20180707-WA0015_Shloka 62_प्राकृत सत्व, रज और तम इन गुणों से बद्ध जीव क
22.
AUD-20180706-WA0015_Shloka 61-62_विशुद्ध सत्व किसे कहते हैं
23.
AUD-20180705-WA0015_ Shloka 56-60_जिस भक्ति द्वारा भगवान वशीभूत होते हैं उस
24.
AUD-20180704-WA0015_Shloka 51-55_गौरहरि अवतार का मुख्य कारण- राधाजी का भाव
25.
AUD-20180703-WA0018_Shloka 47-50_परकीय भाव में ही श्रीकृष्ण का सर्वाधिक उल्
26.
AUD-20180702-WA0007_Shloka 46 अमृतानुकणिका_परकीय रस
27.
AUD-20180701-WA0007_Shloka 46 अमृतानुकणिका_आत्मारामता Vs पररामता
28.
AUD-20180630-WA0007_Shloka 42-46_मधुर रस में दो प्रकार की स्थिति-स्वकीया और
29.
AUD-20180629-WA0007_Shloka 41_श्रीगौरसुंदर- विप्रलम्भ विग्रह
30.
AUD-20180627-WA0007_Shloka 35 अमृतानुकणिका
31.
AUD-20180626-WA0020_ Shloka 35 अमृतानुकणिका_किन साधक भक्तों का आचरण ग्रहणीय
32.
AUD-20180625-WA0009_Shloka 35 अनुभाष्य और अमृतानुकणिका_तत्परायण शब्द की व्य
33.
AUD-20180624-WA0013_Shloka 35 अनुभाष्य_लक्ष्य निर्धारण करते समय रुचि से अधि
34.
AUD-20180623-WA0007_Shloka 35 अनुभाष्य_पांच रति में मधुर रति की अत्यंत दुर्
35.
AUD-20180622-WA0007_Shloka 35 अनुभाष्य_वैकुंठ Vs देवी धाम_मनुष्यरूप में ही
36.
AUD-20180620-WA0017_ Shloka 30-33_भगवान द्वारा प्रपंच में अपनी लीला अवतरण क
37.
AUD-20180618-WA0017_Shloka 30-33_योगमाया द्वारा विप्रलम्भ (वियोग) रस के द्व
38.
AUD-20180621-WA0024_Shloka 34-35_भक्तों पर अनुग्रह करने के लिए भगवान द्वारा
39.
AUD-20180617-WA0006_Shloka 29-30_प्रकट गोलोक धाम में नित्य गोलोक के सब अभिम
40.
AUD-20180615-WA0007_Shloka 26_ मधुर भाव_दो प्रकार का मान
41.
AUD-20180614-WA0030_ Shloka 25-26_चार प्रकार के विरह
42.
AUD-20180613-WA0014_Shloka 22-24_भक्ति के तीन विभाग-बिद्धा भक्ति,अबिद्धा भक
43.
AUD-20180612-WA0014_Shloka 20-22_शुद्धभक्ति के लक्षण
44.
AUD-20180611-WA0014_ Shloka 17-19_ऐश्वर्य ज्ञान मिश्रित (ऐश्वर्य शिथिल प्रे
45.
AUD-20180610-WA0014_Shloka 15-16_रस शब्द के दो अर्थ
46.
AUD-20180609-WA0000_Shloka 15-16_कृष्ण के दो स्वरूपानुबन्धी गुण
47.
AUD-20180608-WA0005_Shloka 15-16_रागमार्ग की भक्ति
48.
AUD-20180607-WA0000_Shloka 5-14_भगवान के जगत में आने का कारण
49.
AUD-20180905-WA0015
50.
AUD-20180901-WA0042
51.
AUD-20180831-WA0026
52.
AUD-20180830-WA0026
53.
AUD-20180829-WA0036
54.
AUD-20180828-WA0036 Shloka 171-181_गोपियों का कृष्ण के प्रति गाढ़ प्रेम
55.
AUD-20180827-WA0036


